नेतरहाट विद्यालय के सफल संचालन में इसके प्राचार्यों का विशिष्ट योगदान रहा है :
श्री चार्ल्स जेम्स नेपियर (अप्रैल,1954 से अगस्त,55 तक)
श्री राधा सिन्हा (सितम्बर,1955 से मार्च, 1956 तक)
श्री जीवननाथ दर (अप्रैल,1956 से दिसम्बर,1966 तक)
श्री वीरेन्द्र कुमार सिन्हा (जनवरी,1967 से फरवरी,1976 तक)
डॉ. रामदेव त्रिपाठी (फरवरी,1976 से फरवरी,1979 तक)
श्री कैलाश नारायण मेहरोत्रा (जून,1979 से अक्टूबर,1980 तक)
श्री मिथिलेश कांति (अक्टूबर,1980 से सितम्बर,1983 तक)
श्री द्वारिका प्रसाद सिन्हा (सितम्बर,1983 से अप्रैल,1986 तक)
श्री सत्यनारायण सिंह (नवम्बर,1986 से अप्रैल,1988 तक)
श्री मंगलदेव पाण्डेय (अगस्त,1988 से अप्रैल,1990 तक)
डॉ. परममित्र शास्त्री (अप्रैल,1990 से सितम्बर,1991 तक)
श्री के. एन. वासुदेवन (सितम्बर,1991 से सितम्बर,1995 तक)
श्री कमलेश्वर प्रसाद (अक्टूबर,1995 से सितम्बर,2000 तक)
श्री नरेन्द्र प्रसाद (सितम्बर,2000 से अगस्त,2003 तक)
श्री विनोद कुमार कर्ण (सितम्बर,2003 से .......................)
आज स्वर्णिम दहलीज से समस्त विद्यालय परिवार इनके प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित करता है।
यह ब्लॉग नेतरहाट विद्यालय की यादों को समर्पित है. नेतरहाट को हम हाटियन न जाने कितने ही विविध रूपों में देखते आते हैं और वो सब कुछ हमारी भावनाओं में सदा प्रवाहित होता रहता है. नेतरहाट में हमने जीवन को जिन खूबसूरत बेहतरीन आयामों के साथ जिया था, उन्हें ही फिर से एक जगह सहेजने का यह लघु प्रयास है. आपके सुझाव यहाँ सादर आमन्त्रित हैं. raghav0435@gmail.com .... awanish413@gmail.com
Sunday, 11 January 2009
Saturday, 10 January 2009
खेलकूद
बात जब छोटे-छोटे और उत्साह से भरे बच्चों की हो तो तो बिना खेलकूद के चर्चा कुछ अधूरी रह जाती है इस विद्यालय में हर वर्ष अन्तर आश्रम्वार्गीय प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। खेलकूद का व्यक्तित्व निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान है। इससे छात्रों में strenght, stemina तथा skill का विकास होता है। 'सम्भव है, जीत आपकी न हो, पर आपका प्रयास सर्वोत्तम होना चाहिए ' इसी मूलमंत्र को आत्मसात करने की परम्परा देती ये खेलकूद प्रतियोगिताएं हमारी परम्परा का अभिन्न अंग हैं। यहाँ पर आउटडोर गेम्स में फुटबॉल, हॉकी, बॉलीबॉल, बास्केटबॉल,क्रिकेट आदि गेम्स हैं, वहीं टेबुल टेनिस, कैरम, शतरंज आदि खेल इन्डोर गेम्स में आते हैं। वार्षिक त्रिदिवसीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता एवं उसके अलावे क्रॉसकन्ट्री प्रतियोगिता का उत्साह दर्शनीय होता है।
यहाँ पर खेलकूद के लिए बहुत अच्छी अधोसंरचनाएं भी मौजूद हैं। कुल 11 मैदानों, न्यूनतम 6-6 बॉलीबॉल, बास्केटबॉल कोर्ट, 2 लॉन टेनिस कोर्ट की व्यवस्था के साथ यहाँ पर खेलकूद के नियत समयक्रम छात्रों को समुचित भागीदारी का अवसर प्रदान करते हैं. इन्डोर गेम्स के लिए हरेक आश्रम में हरेक खेल की सामग्री दी जाती है. सभी आश्रमों में टेबुल टेनिस के बोर्ड भी उपलब्ध कराए गये हैं.
यहाँ पर खेलकूद के लिए बहुत अच्छी अधोसंरचनाएं भी मौजूद हैं। कुल 11 मैदानों, न्यूनतम 6-6 बॉलीबॉल, बास्केटबॉल कोर्ट, 2 लॉन टेनिस कोर्ट की व्यवस्था के साथ यहाँ पर खेलकूद के नियत समयक्रम छात्रों को समुचित भागीदारी का अवसर प्रदान करते हैं. इन्डोर गेम्स के लिए हरेक आश्रम में हरेक खेल की सामग्री दी जाती है. सभी आश्रमों में टेबुल टेनिस के बोर्ड भी उपलब्ध कराए गये हैं.
प्रमुख सर्जनात्मक परम्पराएँ
आश्रम व्यवस्था या अन्य प्रकार की व्यवस्थाएं विद्यालय की आत्मिक परम्पराएँ हैं, पर उस आत्मा के संवर्द्धन के लिए रचनात्मक या प्रयोगधर्मिता उतनी ही आवश्यक है। उसी क्रम में हम यहाँ पर विभिन्न परम्पराओं पर दृष्टिपात करते हुए आगे बढ़ेंगे :
सांस्कृतिक कार्यक्रम :
संस्कृति किसी भी देश की पहचान होती है। लोगों का रहन-सहन, आहार-व्यवहार, क्रिया-कलाप उनकी संस्कृति का निर्माण करते हैं। संक्षेप में, संस्कृति जीवन के विभिन्न आयामों को प्रतिबिंबित करती है और जब बात नेतरहाट विद्यालय की हो तो निश्चय ही अनूठी होगी। नेतरहाट में प्रत्येक वर्ष नियमित रूप से कुछ प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, यथा- हिन्दी एवं अंग्रेजी नाटक प्रतियोगिता, लोकगीत प्रतियोगिता। ये प्रतियोगिताएँ जीवन की रंजक गतिशीलता की द्योतक हैं। आश्रमवर्ग स्तर पर आयोजित होने वाली ये प्रतियोगिताएँ छात्रों की प्रतियोगिताएँ छात्रों की प्रतिभा का संवर्द्धन करती हैं, क्योंकि अपनी प्रस्तुति के चयन, निर्देशन, प्रस्तुत करने की शैली, अभ्यास, परिकल्पना एवं अन्य विशेषताएँ छात्रों के द्वारा ही होती हैं। ये सांस्कृतिक कार्यकर्म हमारी समृद्ध संस्कृति के द्योतक हैं। स्वस्थ एवं अच्छी प्रतिस्पर्द्धा के लिए विजेता आश्रमवर्ग को सहभोज भी दिए जाने की परम्परा रही है। 'सहभोज' अर्थात् साथ बैठकर करनाऔर इसका आनंद वर्णनातीत है, विशेषकर छात्रों का रुझान इस ओर काफी ज्यादा होता है क्योंकि इसमे विशेष तौर पर तैयार व्यंजन परोसे जाते हैं। अन्त्याक्षरी भी हमारा प्रमुख साहित्यिक, सासंकृतिक कार्यक्रम है एवं हमारे विद्यालय के वातावरण को रसमय बनाने में सांस्कृतिक कार्यकमों का विशिष्ट योगदान है।
अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता :
अन्त्याक्षरी हमारे विद्यालय की एक विशिष्ट परम्परा है। यहाँ की कुछ चीजें, जो यहाँ के छात्रों को सदा स्मरण रहती है, उनमें पैदा करती, गुदगुदाती हैं, उनमें अन्त्याक्षरी भी एक है। कविताओं के लयबद्ध ओजपूर्ण पाठ से भाव-विभोर कर देने वाली यह प्रतियोगिता अविस्मरनीय है, चाहे वे मधुशाला की मंत्रमुग्ध कर देने वाली पंक्तियाँ हो, चाहे परमानंद का संचरण करने वाली 'रागिनी हूँ.....' हो या 'ओज और उत्साह' से भर देने वाले रश्मिरथी के छंद, सबका अलग-अलग आकर्षण है। मानस, कामायनी, भारत-भारती, उर्वशी, हुंकार या फिर निराला, अज्ञेय, पन्त, मुक्तिबोध के छंदों की भावधारा एक अलग ही संसार की सृष्टि करती है। आज भी हमारे पूर्ववर्त्ती अग्रजों का अन्त्याक्षरी के प्रति विशेष योगदान उल्लेखनीय है।
यह अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता मुख्यतः अन्तरवर्षीय स्तर पर आयोजित होती है।
नाटक प्रतियोगिता :
प्रतिवर्ष होने वाली हिन्दी और अंगेरजी नाटक प्रतियोगिता का आयोजन हमारी रचना-धर्मिता को उभरता है। प्रत्येक वर्ष विद्यालय स्तर पर मंचित होने वाले नाटकों के अलावे अन्तराश्रमवर्गीय नाटक प्रतियोगिता के अंतर्गत सात हिन्दी एवं सात अंग्रेजी नाटकों का मंचन, उनके आयोजन की व्यवस्था, अभिनय की तैयारी व् परिणामों के प्रति उत्सुकता हमारे क्रियाकलाप का एक अभिन्न अंग है। नाटक के आयोजन के समय मंच-सज्जा, रूप-सज्जा एवं प्रकाश व्यवस्था आदि कार्य छात्रों के द्वारा ही किए जाते हैं। इस क्रम में सम्बंधित आश्रमाध्यक्ष छात्रों का निर्देशन करते हैं। वहीँ 15 नवम्बर को होने वाले विद्यालय नाटकों का स्तर और भी उत्कृष्ट रहता है। अब तक मंचित नाटकों में ध्रुवस्वामिनी, दीपदान, सम्राट कनिष्क, कृपाण की धार, मर्यादा की वेदी पर, कोणार्क, कफ़न, हवालात, बकरी, कौमुदी महोत्सव, भगवदज्जुकम आदि प्रमुख हैं।
दिवस/समारोह :
इनके अतिरिक्त वर्षभर विभिन्न जयंतियों एवं दिवसों का भी आयोजन किया जाता रहा है। गांधी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अम्बेदकर, राधाकृष्णन (शिक्षक दिवस) आदि का भी वार्षिक आयोजन हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है इसके अलावे हिन्दी विभाग के तत्त्वाधान में तुलसी, दिनकर आदि की जयंतियों को मानाने के साथ-साथ हिन्दी दिवस आदि के द्वारा मातृभाषा के प्रति श्रद्धा भी निवेदित की जाती है। दिवस और जयंतियों के अलावे विभिन्न सेमिनार, वाद-विवाद, भाषण आदि प्रतियोगिताओं का भी वार्षिक आयोजन होता है।
सांस्कृतिक कार्यक्रम :
संस्कृति किसी भी देश की पहचान होती है। लोगों का रहन-सहन, आहार-व्यवहार, क्रिया-कलाप उनकी संस्कृति का निर्माण करते हैं। संक्षेप में, संस्कृति जीवन के विभिन्न आयामों को प्रतिबिंबित करती है और जब बात नेतरहाट विद्यालय की हो तो निश्चय ही अनूठी होगी। नेतरहाट में प्रत्येक वर्ष नियमित रूप से कुछ प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं, यथा- हिन्दी एवं अंग्रेजी नाटक प्रतियोगिता, लोकगीत प्रतियोगिता। ये प्रतियोगिताएँ जीवन की रंजक गतिशीलता की द्योतक हैं। आश्रमवर्ग स्तर पर आयोजित होने वाली ये प्रतियोगिताएँ छात्रों की प्रतियोगिताएँ छात्रों की प्रतिभा का संवर्द्धन करती हैं, क्योंकि अपनी प्रस्तुति के चयन, निर्देशन, प्रस्तुत करने की शैली, अभ्यास, परिकल्पना एवं अन्य विशेषताएँ छात्रों के द्वारा ही होती हैं। ये सांस्कृतिक कार्यकर्म हमारी समृद्ध संस्कृति के द्योतक हैं। स्वस्थ एवं अच्छी प्रतिस्पर्द्धा के लिए विजेता आश्रमवर्ग को सहभोज भी दिए जाने की परम्परा रही है। 'सहभोज' अर्थात् साथ बैठकर करनाऔर इसका आनंद वर्णनातीत है, विशेषकर छात्रों का रुझान इस ओर काफी ज्यादा होता है क्योंकि इसमे विशेष तौर पर तैयार व्यंजन परोसे जाते हैं। अन्त्याक्षरी भी हमारा प्रमुख साहित्यिक, सासंकृतिक कार्यक्रम है एवं हमारे विद्यालय के वातावरण को रसमय बनाने में सांस्कृतिक कार्यकमों का विशिष्ट योगदान है।
अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता :
अन्त्याक्षरी हमारे विद्यालय की एक विशिष्ट परम्परा है। यहाँ की कुछ चीजें, जो यहाँ के छात्रों को सदा स्मरण रहती है, उनमें पैदा करती, गुदगुदाती हैं, उनमें अन्त्याक्षरी भी एक है। कविताओं के लयबद्ध ओजपूर्ण पाठ से भाव-विभोर कर देने वाली यह प्रतियोगिता अविस्मरनीय है, चाहे वे मधुशाला की मंत्रमुग्ध कर देने वाली पंक्तियाँ हो, चाहे परमानंद का संचरण करने वाली 'रागिनी हूँ.....' हो या 'ओज और उत्साह' से भर देने वाले रश्मिरथी के छंद, सबका अलग-अलग आकर्षण है। मानस, कामायनी, भारत-भारती, उर्वशी, हुंकार या फिर निराला, अज्ञेय, पन्त, मुक्तिबोध के छंदों की भावधारा एक अलग ही संसार की सृष्टि करती है। आज भी हमारे पूर्ववर्त्ती अग्रजों का अन्त्याक्षरी के प्रति विशेष योगदान उल्लेखनीय है।
यह अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता मुख्यतः अन्तरवर्षीय स्तर पर आयोजित होती है।
नाटक प्रतियोगिता :
प्रतिवर्ष होने वाली हिन्दी और अंगेरजी नाटक प्रतियोगिता का आयोजन हमारी रचना-धर्मिता को उभरता है। प्रत्येक वर्ष विद्यालय स्तर पर मंचित होने वाले नाटकों के अलावे अन्तराश्रमवर्गीय नाटक प्रतियोगिता के अंतर्गत सात हिन्दी एवं सात अंग्रेजी नाटकों का मंचन, उनके आयोजन की व्यवस्था, अभिनय की तैयारी व् परिणामों के प्रति उत्सुकता हमारे क्रियाकलाप का एक अभिन्न अंग है। नाटक के आयोजन के समय मंच-सज्जा, रूप-सज्जा एवं प्रकाश व्यवस्था आदि कार्य छात्रों के द्वारा ही किए जाते हैं। इस क्रम में सम्बंधित आश्रमाध्यक्ष छात्रों का निर्देशन करते हैं। वहीँ 15 नवम्बर को होने वाले विद्यालय नाटकों का स्तर और भी उत्कृष्ट रहता है। अब तक मंचित नाटकों में ध्रुवस्वामिनी, दीपदान, सम्राट कनिष्क, कृपाण की धार, मर्यादा की वेदी पर, कोणार्क, कफ़न, हवालात, बकरी, कौमुदी महोत्सव, भगवदज्जुकम आदि प्रमुख हैं।
दिवस/समारोह :
इनके अतिरिक्त वर्षभर विभिन्न जयंतियों एवं दिवसों का भी आयोजन किया जाता रहा है। गांधी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अम्बेदकर, राधाकृष्णन (शिक्षक दिवस) आदि का भी वार्षिक आयोजन हमारी परम्पराओं में शामिल रहा है इसके अलावे हिन्दी विभाग के तत्त्वाधान में तुलसी, दिनकर आदि की जयंतियों को मानाने के साथ-साथ हिन्दी दिवस आदि के द्वारा मातृभाषा के प्रति श्रद्धा भी निवेदित की जाती है। दिवस और जयंतियों के अलावे विभिन्न सेमिनार, वाद-विवाद, भाषण आदि प्रतियोगिताओं का भी वार्षिक आयोजन होता है।
Friday, 9 January 2009
आश्रम व्यवस्था
'सहनाववतु सहनौभुनक्तु सहवीर्यंकरवावहै
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै'
इस परम्परा-प्रकृति को उद्भूत करने वाली आश्रम व्यवस्था हमारे विद्यालय की नींव है जो गुरुकुल पद्धतियों का समावेश कर शिक्षा के विशिष्ट पहलुओं को पूर्ण करती है। आश्रम व्यवस्था प्रारंभ से ही इस विद्यालय की योजना में शामिल रही है। शुरुआत में काजमी रिपोर्ट में 6 हाउस (वर्त्तमान आश्रमवर्ग) की परिकल्पना थी, जहाँ 1 house 4 आश्रमों का बना होता और इस प्रकार आश्रमों की कुल संख्या 24 होती। वहीँ कुछ मौलिक परिवर्त्तनों के साथ वर्त्तमान आश्रम व्यवस्था अस्तित्व में आई जिसमें 3 आश्रमों का 1 आश्रमवर्ग होता है। वर्त्तमान में विद्यालय में 21 आश्रम (7 आश्रमवर्ग) हैं।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै'
आश्रमों में एक निश्चित संख्या में (लगभग 20-25) में छात्र आश्रमाध्यक्षों के निर्देशन में रहते हैं। आश्रम में रहने वाले सभी वरीय एवं कनीय छात्र आश्रमाध्यक्ष के निर्देशन में पारिवारिक माहौल के तहत रहते हैं। बंधुत्व व सामाजिक समरसता की अवधारणा का परिपोषण छात्रों के मानस पटल पर एक अमित छाप छोड़ता है। वरीय छात्र विद्यालय के सभी क्रिया-कलापों में कनीय छात्रों का मार्ग निर्देशन करते हैं, जो उनमें प्रबंधन एवं निर्देशन की उन्नत योग्यता विकसित करता है। आश्रमवर्ग ही सभी प्रतियोगिताओं की इकाई रूप होते हैं, अतः ये सहयोगात्मक एवं सामुदायिक भावना का विकास करने की प्रयोगशाला है। रिश्तों की दृढ़ता, दायित्व-बोध, भावात्मक उन्नयन आदि कई अनमोल चीजें आश्रम व्यवस्था की सामान्य चीजों यथा- स्वावलम्बन, आचार-विचार, पहल करने की क्षमता, सामाजिकता आदि चीजें तो इसी आश्रम व्यवस्था की देन हैं।
आश्रमाध्यक्ष छात्र के सर्वतोन्मुखी विकास के लिए प्रेरक होते हैं। वे अपने आश्रम के अन्तेवासियों की उत्तरोत्तर प्रगति का लेखा-जोखा रखते हैं तथा इन्हे दिशा-निर्देश देते हैं। उनका कर्तव्य है कि छात्रों की रूचि, उन्मुखता का अवलोकन करें एवं उनमें विविध गतिविधियों को क्रियान्वित करने के लिए संवर्धक का कार्य करें ताकि छात्रों का समेकित विकास सम्भव हो सके।
संस्थापक योजनाकार श्री एफ. जी. पियर्स का कथन- "छात्रों में सामाजिकता, स्वावलंबन, आपसी सहयोग, दायित्व-बोध, अनुशासन आदि का विकास इस आश्रम व्यवस्था से ही सरलता से सम्भव है। यह मेरा 40 वर्षों का अनुभव कहता है। शिक्षकों के आश्रम में बच्चों के साथ रहने पर उनके अन्दर स्वस्थ पारिवारिक समझ विकसित होगी तथा उनका सुसंस्कृत विकास होगा।" हमारे विद्यालय की आश्रम व्यवस्था के मूल में है।
आश्रमाध्यक्ष की पत्नी छात्रों की माता का दायित्व निभाती हैं.छात्र उन्हें 'माताजी' कह कर संबोधित करते हैं। उनका यह कर्त्तव्य है कि वे आश्रम में एक पारिवारिक माहौल बनाएँ और उसे कायम रखें। आश्रममाता वात्सल्य रस की प्रतिमूर्त्ति होती हैं। वे छात्रों के भावनात्मक पक्ष को परिपुष्ट करती हैं और अपनी स्नेहधारा से उनके अन्दर की रिक्तता, शुष्कता को भरती हैं। छात्रों की छोटी-छोटी आवश्यकताओं के ऊपर ध्यान देना उन्हीं का कर्त्तव्य है। छात्रों के भोजनादि की व्यवस्था व देखरेख वे पाकशाला प्रभारी के रूप में करती हैं। आश्रमाध्यक्षों की गैर-मौजूदगी में आश्रममाता उनका कार्यभार लेती हैं।आश्रमाध्यक्ष के पूरे परिवार के रहने की व्यवस्था छात्रों के साथ उसी आश्रम में होती है, जिनका उन्हें कार्यभार मिला होता है।
इस प्रकार आश्रमाध्यक्ष, आश्रममाता एवं छात्र आश्रम के स्तम्भ हैं। यहाँ की आश्रमव्यवस्था यहाँ के छात्रों की गुणात्मक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है।
आश्रमों के नाम इस प्रकार हैं :
क. प्रथम आश्रमवर्ग :
1. शान्ति आश्रम 2. अरुण आश्रम 3. गौतम आश्रम
ख. द्वितीय आश्रमवर्ग :
4. आनंद आश्रम 5. प्रेम आश्रम 6. अर्जुन आश्रम
ग. तृतीय आश्रमवर्ग :
7. अशोक आश्रम 8. साकेत आश्रम 9. किशोर आश्रम
घ. चतुर्थ आश्रमवर्ग :
10. नालंदा आश्रम 11. विक्रम आश्रम 12. तक्षशिला आश्रम
च. पंचम आश्रमवर्ग :
13. रमन आश्रम 14. बोस आश्रम 15. भाभा आश्रम
छ. षष्ठ आश्रमवर्ग :
16.अरविन्द आश्रम 17.प्रदीप आश्रम 18.रामकृष्ण आश्रम
ज. सप्तम आश्रमवर्ग :
19. कपिल आश्रम 20. कणाद आश्रम 21. कण्व आश्रम
Thursday, 8 January 2009
अनुपम शिक्षण व्यवस्था
नेतरहाट विद्यालय की शिक्षण व्यवस्था में ऐसे मूल्यवान शैक्षिक विकास के मनोभावों तथा आदर्शों को संजोया गया है, जो उन्नत उर्ध्वोन्मुखी व्यक्तित्व का निर्माण करने में पूरी तरह से सक्षम है। इस शिक्षण व्यवस्था की एक-एक प्रक्रिया इतनी तराशी हुई है कि उनके परिणामों तथा उद्देश्यों की विवेचना शिक्षा की मौलिक भावना को सहजता से प्रकाशित करती है। प्रकृति के सान्निध्य में यह शिक्षण प्रणाली अपने उत्कृष्ट रूप को सरलता से प्रस्तुत करती है।
स्वाध्याय :
यह यहाँ की शिक्षण व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है। स्वाध्याय को यहाँ की मौलिक आवश्यकता के रूप में परिभाषित किया गया है। आश्रमों में छात्रों का अधिकांश समय स्वाध्याय को ही समर्पित रहता है। जिस प्रकार भोजन से पूर्व यहाँ भोजन मंत्र के मंत्रोच्चारण की परम्परा रही है, उसी प्रकार यहाँ स्वाध्याय की शुरुआत भी स्वाध्याय मंत्र के उच्चारण के साथ होती है। स्वाध्याय के समय सभी छात्र एक साथ 'स्वाध्याय कक्ष' में बैठकर स्वाध्याय करते हैं एवं उस दौरान किसी भी प्रकार की अनावश्यक ध्वनि का उच्चारण वर्जित होता है। स्वाध्याय की विधा ही अध्ययन का सर्वस्व है। कहा गया है-"स्वाध्यायात् मा प्रमदः"। स्वाध्याय की यह विधा पुस्तकालय के माध्यम से पूर्णता को प्राप्त करती है। शिक्षकों का मूलधर्म यहाँ छात्रों को जिज्ञासा का पात्र बनाकर पुस्तकों के अवगाहन के लिए प्रेरित करना हैं। उस क्रम में उत्पन्न समस्याओं के समाधान के समाधान के क्रम में छात्र शिक्षकों की थोडी-बहुत मदद लेते हैं। स्वाध्याय की यह प्रक्रिया यहाँ के छात्रों में आत्मचिंतन, आत्मविकास की प्रवृत्ति को बढावा देती है तथा विषयों के मूल में जाने की सहज योग्यता प्रदान करती है। इन सब चीजों को जानकर यह सहज ही मालूम होता है कि प्रकृति का इसमें कितना विशिष्ट योगदान है।
पुस्तकालय :
विद्यालय स्तर पर 45,000 से भी ज्यादा पुस्तकों से युक्त नेतरहाट विद्यालय पुस्तकालय में छात्रों को उच्च स्तर की सुविधाएं प्राप्त हैं। यहाँ छात्रों को विषयों का प्रवह ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षा-साहित्य की हरेक विधा के आरम्भ से स्नातकोत्तर स्तर तक की पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिससे छात्रों को अपने-अपने विषयों में पूरी गहराई में जाने का अवसर सहजता से मिलता है। शिक्षा के पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकों के साथ-साथ प्रयुक्त पाठ्यक्रमेत्तर विषयों की पुस्तकें भी समग्र ज्ञान के उद्देश्य से यहाँ उपलब्ध हैं। दशाधिक दैनिक समाचारपत्रों एवं इसकी ही तिगुनी-चौगुनी संख्या में आने वाली विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धता छात्रों के ज्ञान को अद्यतन (अप-टू-डेट) बनाती है। यहाँ के पुस्तकालय की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की 'उन्मुक्त पुस्तकालय' (खुली दराज़ प्रणाली) या ओपन सेल्फ सिस्टेम है। छात्र यहाँ बिना किसी औपचारिकता के इच्छित पुस्तकों को लेकर उनका लाभ उठा सकते हैं। पुस्तकों को इच्छानुसार उनकी जगह से वे स्वयं ही ले सकते हैं, इसमे कोई बंदिश नही रहती है। यह व्यवस्था छात्रोन्मुखी है और दुनिया के अधिकांशतः पुस्तकालयों में नहीं है।
प्रयोगशाला :
पुस्तकालय के बाद हमारे लिए शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण और रोचक स्थान यहाँ की प्रयोगशालाएं एवं कार्यशालाएं हैं। प्रयोगशालाएं अच्छे व उन्नत यंत्रों तथा रसायनों से सुसज्जित रहने के कारन रूचि के पोषण के साथ-साथ छात्रों के व्यावहारिक ज्ञान को भी विकसित करती है। भौतिकी तथा रसायन प्रयोगशाला में मानव या उसके संसाधनों की भूमिका प्रत्यक्षतः रहती है, वहीं यहाँ की जीवविज्ञान प्रयोगशाला में प्रकृति की भूमिका स्पष्टतया अनुभूत की जा सकती है। सर्पों की अनेकानेक किस्में, समृद्ध जीव जगत, समृद्ध पारिस्थिक तंत्र की उपलब्धता छात्रों के सामान्य एवं व्यावहारिक ज्ञान का विस्तार करती है। प्रयोगशालाओं का उद्देश्य भी छात्रों के सैद्धांतिक ज्ञान को पूर्णता देना है। प्रयोगशालाओं की उत्तमता छात्रों को गुणात्मक शिक्षा व श्रेष्ठता दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।
यहाँ के पुस्तकालय में उपलब्ध स्नाकोत्तर स्तर तक की पुस्तकों तथा प्रयोगशालाओं में उपलब्ध स्नातक स्तर तक की प्रायोगिक सुविधाओं को देखकर अन्य संस्थानों यथा- रांची विश्वविद्यालय के बाह्य परीक्षकों को भी ईर्ष्या होती थी। यहाँ के पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं के उत्कृष्ट स्तर को देखकर अपने समय के प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री श्री जी. पी. दुबे ने कहा था- 'इन छात्रों के लिए भला ऐसे समृद्ध पुस्तकालय एवं प्रायोगिक उपकरणों की क्या आवश्यकता थी?'
कार्यशालाएँ :
प्रयोगशालाओं के अतिरिक्त कार्यशालाएँ भी व्यावहारिक ज्ञान का प्रमुख स्रोत रही हैं। वे बहुत ही उच्च कोटि कीवं उत्तम यंत्रों से सुसज्जित हैं। काष्ठनिर्माणशाला तथा लौहनिर्माणशाला उन्नत यंत्रों से युक्त है तथा छात्र यहाँ काष्ठकला व धातुकला के विषय में उच्च कोटि का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये विभाग छात्रों को उत्पादकता की मौलिक कसौटियों की समझ एवं यंत्रों की कार्यपद्धति के बारे में एक विशेष अन्तःदृष्टि विकसित करते हैं।
स्वाध्याय :
यह यहाँ की शिक्षण व्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है। स्वाध्याय को यहाँ की मौलिक आवश्यकता के रूप में परिभाषित किया गया है। आश्रमों में छात्रों का अधिकांश समय स्वाध्याय को ही समर्पित रहता है। जिस प्रकार भोजन से पूर्व यहाँ भोजन मंत्र के मंत्रोच्चारण की परम्परा रही है, उसी प्रकार यहाँ स्वाध्याय की शुरुआत भी स्वाध्याय मंत्र के उच्चारण के साथ होती है। स्वाध्याय के समय सभी छात्र एक साथ 'स्वाध्याय कक्ष' में बैठकर स्वाध्याय करते हैं एवं उस दौरान किसी भी प्रकार की अनावश्यक ध्वनि का उच्चारण वर्जित होता है। स्वाध्याय की विधा ही अध्ययन का सर्वस्व है। कहा गया है-"स्वाध्यायात् मा प्रमदः"। स्वाध्याय की यह विधा पुस्तकालय के माध्यम से पूर्णता को प्राप्त करती है। शिक्षकों का मूलधर्म यहाँ छात्रों को जिज्ञासा का पात्र बनाकर पुस्तकों के अवगाहन के लिए प्रेरित करना हैं। उस क्रम में उत्पन्न समस्याओं के समाधान के समाधान के क्रम में छात्र शिक्षकों की थोडी-बहुत मदद लेते हैं। स्वाध्याय की यह प्रक्रिया यहाँ के छात्रों में आत्मचिंतन, आत्मविकास की प्रवृत्ति को बढावा देती है तथा विषयों के मूल में जाने की सहज योग्यता प्रदान करती है। इन सब चीजों को जानकर यह सहज ही मालूम होता है कि प्रकृति का इसमें कितना विशिष्ट योगदान है।
पुस्तकालय :
विद्यालय स्तर पर 45,000 से भी ज्यादा पुस्तकों से युक्त नेतरहाट विद्यालय पुस्तकालय में छात्रों को उच्च स्तर की सुविधाएं प्राप्त हैं। यहाँ छात्रों को विषयों का प्रवह ज्ञान प्राप्त करने के लिए शिक्षा-साहित्य की हरेक विधा के आरम्भ से स्नातकोत्तर स्तर तक की पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिससे छात्रों को अपने-अपने विषयों में पूरी गहराई में जाने का अवसर सहजता से मिलता है। शिक्षा के पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकों के साथ-साथ प्रयुक्त पाठ्यक्रमेत्तर विषयों की पुस्तकें भी समग्र ज्ञान के उद्देश्य से यहाँ उपलब्ध हैं। दशाधिक दैनिक समाचारपत्रों एवं इसकी ही तिगुनी-चौगुनी संख्या में आने वाली विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धता छात्रों के ज्ञान को अद्यतन (अप-टू-डेट) बनाती है। यहाँ के पुस्तकालय की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की 'उन्मुक्त पुस्तकालय' (खुली दराज़ प्रणाली) या ओपन सेल्फ सिस्टेम है। छात्र यहाँ बिना किसी औपचारिकता के इच्छित पुस्तकों को लेकर उनका लाभ उठा सकते हैं। पुस्तकों को इच्छानुसार उनकी जगह से वे स्वयं ही ले सकते हैं, इसमे कोई बंदिश नही रहती है। यह व्यवस्था छात्रोन्मुखी है और दुनिया के अधिकांशतः पुस्तकालयों में नहीं है।
प्रयोगशाला :
पुस्तकालय के बाद हमारे लिए शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण और रोचक स्थान यहाँ की प्रयोगशालाएं एवं कार्यशालाएं हैं। प्रयोगशालाएं अच्छे व उन्नत यंत्रों तथा रसायनों से सुसज्जित रहने के कारन रूचि के पोषण के साथ-साथ छात्रों के व्यावहारिक ज्ञान को भी विकसित करती है। भौतिकी तथा रसायन प्रयोगशाला में मानव या उसके संसाधनों की भूमिका प्रत्यक्षतः रहती है, वहीं यहाँ की जीवविज्ञान प्रयोगशाला में प्रकृति की भूमिका स्पष्टतया अनुभूत की जा सकती है। सर्पों की अनेकानेक किस्में, समृद्ध जीव जगत, समृद्ध पारिस्थिक तंत्र की उपलब्धता छात्रों के सामान्य एवं व्यावहारिक ज्ञान का विस्तार करती है। प्रयोगशालाओं का उद्देश्य भी छात्रों के सैद्धांतिक ज्ञान को पूर्णता देना है। प्रयोगशालाओं की उत्तमता छात्रों को गुणात्मक शिक्षा व श्रेष्ठता दिलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है।
यहाँ के पुस्तकालय में उपलब्ध स्नाकोत्तर स्तर तक की पुस्तकों तथा प्रयोगशालाओं में उपलब्ध स्नातक स्तर तक की प्रायोगिक सुविधाओं को देखकर अन्य संस्थानों यथा- रांची विश्वविद्यालय के बाह्य परीक्षकों को भी ईर्ष्या होती थी। यहाँ के पुस्तकालय एवं प्रयोगशालाओं के उत्कृष्ट स्तर को देखकर अपने समय के प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री श्री जी. पी. दुबे ने कहा था- 'इन छात्रों के लिए भला ऐसे समृद्ध पुस्तकालय एवं प्रायोगिक उपकरणों की क्या आवश्यकता थी?'
कार्यशालाएँ :
प्रयोगशालाओं के अतिरिक्त कार्यशालाएँ भी व्यावहारिक ज्ञान का प्रमुख स्रोत रही हैं। वे बहुत ही उच्च कोटि कीवं उत्तम यंत्रों से सुसज्जित हैं। काष्ठनिर्माणशाला तथा लौहनिर्माणशाला उन्नत यंत्रों से युक्त है तथा छात्र यहाँ काष्ठकला व धातुकला के विषय में उच्च कोटि का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। ये विभाग छात्रों को उत्पादकता की मौलिक कसौटियों की समझ एवं यंत्रों की कार्यपद्धति के बारे में एक विशेष अन्तःदृष्टि विकसित करते हैं।
संगीत :
यह हमारे विद्यालय में यह एक उन्नत विरासत के रूप में विद्यमान है। विभिन्न विषयों के बीच ये विभाग (कला एवं संगीत) हमारा कौशलवर्द्धन करते हैं। ये हमें मनोरंजन की विधा को देते हुए एक रचनात्मक योग्यता से परिपूर्ण करते हैं।
संगीत में हम संगीत की आधारभूत बातों को जानते हुए विभिन्न वाद्ययंत्रों विशेषकर तबला एवं हारमोनियम का ज्ञान प्राप्त करते हैं। साथ ही 'वृन्द वादन' के अंतर्गत भाग लेने वाले छात्र इनके अतिरिक्त विभिन्न वाद्ययंत्रों को बजाने की कला सीखते हैं। संगीत एवं कला के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने पर उन्हें आत्मिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नयन के साधन के रूप में जान पाते हैं। विद्या और कला (सम्पूर्ण रूप में) का अभिन्न सम्बन्ध माना गया है और इस दृष्टिकोण से हम संगीत में उसके भावों, उद्देश्यों, साधनों की गहराईयों का भली-भांति अनुभव कर पाते हैं।
कला :
कला हमारी रचनात्मकता को एक दिशा, एक योग्यता प्रदान करती है। कला की समुचित अवधारणायें जो प्राचीन काल से अब तक विद्यमान हैं और क्रमशः विकसित होकर आगे बढती जा रही है, उनकी जानकारी हमें सहज ही मिल जाती है। छात्रों के विषयगत कौशलों के परिवर्द्धन-परिसंस्करण पर जोर देते हुए बहुआयामी शिक्षा पर जोर दिया जाता था, जिसके अंतर्गत योजना थी कि नेतरहाट के छात्र ललित कलाओं में भी अग्रणी निकलें। तूलिका से रेखाचित्रण, भावचित्रण, संगीतकला, अभिनयकला, प्रस्तर मूर्त्तिकला, मृण्मय मूर्त्तिकला, काष्ठ मूर्त्तिकला के अलावे कोलाज, डिजाइन आदि के विभिन्न आयामों की भी छात्रों को शिक्षा दी जाए, ऐसा उद्देश्य भी था। इस क्षेत्र में महर्षि टैगोर के शान्तिनिकेतन को सामने रखा गया था। ललित कलाओं में यहाँ पर उपलबद्ध संसाधनों के ही उपयोग पर जोर डाला गया है।
कला की जीवंत अवधारणा को आत्मसात करने में यहाँ की प्रकृति का छात्रों को महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। प्रकृति हमें वे सारे उपादान, अभिधा, लक्षणा और व्यंजना रूपों में ही उपलब्द्ध कराती है, जिससे कल्पना को विस्तार देने में छात्रों को मदद मिलती है। प्रकृति कला के शिक्षा-प्रदर्श्यों के निर्माण में हमारी बहुत बड़ी सहायता करती है।
श्रमदान :
यहाँ की उन परम्पराओं में श्रमदान अपना विशिष्ट स्थान रखता है, जो छात्रों को सहयोग एवं उत्तरदायित्व का बोध कराती हैं।विद्यालय के निर्माण के समय से ही विद्यालय मे श्रमदान की सुदृढ परम्परा रही है। इससे छात्रों में सामूहिक भावना का विकास होता है। गांधी जयन्ती के अवसर पर छात्र विद्यालय के आस-पास के क्षेत्रों मे भी श्रमदान किया करते हैं।
हॉबी-क्लब :
छात्रों को उनकी रुचियों में उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए एयरो-मॉडलिंग, शिप-मॉडलिंग, राइफल क्लब, रेडियो क्लब, स्टांप-कलेक्शन (टिकट-संग्रहण), फोटोग्राफी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑर्निथोलॉजी, सिक्का-संग्रहण, बागवानी, स्टार-गेजिंग, पत्रकारिता, पाठ्यक्रमेत्तर भाषाओं यथा- बांगला, फ्रेंच आदि के जानकर शिक्षकों से उनका प्रशिक्षण, सामान्य जानकारी आदि लेने का उद्देश्य रखा गया था।
छात्रों को कृषि एवं वानिकी की भी शिक्षा दी जाती रही है। छात्रों को ग्रामीण परिवेश में रखकर इनकी शिक्षा देने के पीछे का उद्देश्य यह था कि ये छात्र जो कल देश और समाज का प्रतिनिधिनित्व करेंगे, ग्राम्य जीवन की बारीकियों को भी समझते रहें और अपनी वास्तविक जड़ से जुड़े रहकर उनके कल्याण के प्रति समर्पित रहें।
एन. सी. सी. :
छात्रों में विभिन्न गुणों को भरने के क्रम में तथा नेतृत्व-क्षमता, सामूहिकता आदि के विकास के लिए एन। एन. सी., स्काउट आदि भी नियमित समयचर्या में शामिल है. यहाँ पर एन. सी. सी. की तीनों इकाईयाँ (आर्मी, एयर व नेवल विंग) हैं.
कक्षा-व्यवस्था :
यहाँ की शिक्षा को गुणात्मक बनाने में छात्रों पर व्यक्तिगत निर्देशन का महत्वपूर्ण योगदान है। छात्रों को कम संख्या वाले निकायों में मेधा के आधार पर बांटकर शिक्षा देने की प्रक्रिया छात्रों के शिक्षण को समुचित पोषण देती है। पूर्व में एक सत्र में 60 लड़कों का एक बैच आता था, लेकिन अभी के 100 छात्रों के बैच में उन्हें 25-25 के चार उपवर्गों में मेधा के अनुसार रखा जाता है, जिससे छात्र-शिक्षक संवाद-संबंधों का यथेष्ट विकास होता है। छात्रों के व्यक्तित्व-निर्माण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। छात्रों के मेधा-परिक्षण की निरंतरता उनके अन्दर की ज्ञान की ज्योति को जाज्वल्यमान बनाए रखती है। मासिक, त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं के आयोजन से छात्रों की मेधा का उत्तरोत्तर उन्नयन होता रहता है। छात्रों की मेधा के उन्नायक के रूप में शिक्षकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विद्यालय के सभी शिक्षक उच्च उपाधि प्राप्तकर्ता हैं और शायद ही कोई ऐसा माध्यमिक विद्यालय हो, जहाँ ऐसे विषय-शिक्षक हों, जो अपने-अपने विषय में न्यूनतम स्नातकोत्तर तथा विशिष्ट उपलब्धि वाले हो। उनकी योग्यताएँ भी उच्चस्तरीय हैं। स्टाफ रूम के अलावे हरेक शिक्षक को अपना अलग-अलग प्रकोष्ठ मिलता है और साथ ही उनके पढाने के कक्ष भी नियत होते हैं। ये प्रकोष्ठ उन कक्षों से सटे होते हैं। ये कक्ष preparatory room की तरह उपयोग में लाए जाते हैं। शिक्षक कक्षा लेने से पूर्व कुछ देखकर या पूर्व तैयारी करने के उद्देश्य से इसका उपयोग करते हैं। छात्रों के गृहकार्य की वे यहीं जाँच करते हैं और छात्रों की प्रगति का मूल्यांकन एवं अन्य शिक्षोपयोगी उपकरणों को रखने के लिए शिक्षक प्रकोष्ठ का उपयोग करते हैं।
यह हमारे विद्यालय में यह एक उन्नत विरासत के रूप में विद्यमान है। विभिन्न विषयों के बीच ये विभाग (कला एवं संगीत) हमारा कौशलवर्द्धन करते हैं। ये हमें मनोरंजन की विधा को देते हुए एक रचनात्मक योग्यता से परिपूर्ण करते हैं।
संगीत में हम संगीत की आधारभूत बातों को जानते हुए विभिन्न वाद्ययंत्रों विशेषकर तबला एवं हारमोनियम का ज्ञान प्राप्त करते हैं। साथ ही 'वृन्द वादन' के अंतर्गत भाग लेने वाले छात्र इनके अतिरिक्त विभिन्न वाद्ययंत्रों को बजाने की कला सीखते हैं। संगीत एवं कला के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने पर उन्हें आत्मिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नयन के साधन के रूप में जान पाते हैं। विद्या और कला (सम्पूर्ण रूप में) का अभिन्न सम्बन्ध माना गया है और इस दृष्टिकोण से हम संगीत में उसके भावों, उद्देश्यों, साधनों की गहराईयों का भली-भांति अनुभव कर पाते हैं।
कला :
कला हमारी रचनात्मकता को एक दिशा, एक योग्यता प्रदान करती है। कला की समुचित अवधारणायें जो प्राचीन काल से अब तक विद्यमान हैं और क्रमशः विकसित होकर आगे बढती जा रही है, उनकी जानकारी हमें सहज ही मिल जाती है। छात्रों के विषयगत कौशलों के परिवर्द्धन-परिसंस्करण पर जोर देते हुए बहुआयामी शिक्षा पर जोर दिया जाता था, जिसके अंतर्गत योजना थी कि नेतरहाट के छात्र ललित कलाओं में भी अग्रणी निकलें। तूलिका से रेखाचित्रण, भावचित्रण, संगीतकला, अभिनयकला, प्रस्तर मूर्त्तिकला, मृण्मय मूर्त्तिकला, काष्ठ मूर्त्तिकला के अलावे कोलाज, डिजाइन आदि के विभिन्न आयामों की भी छात्रों को शिक्षा दी जाए, ऐसा उद्देश्य भी था। इस क्षेत्र में महर्षि टैगोर के शान्तिनिकेतन को सामने रखा गया था। ललित कलाओं में यहाँ पर उपलबद्ध संसाधनों के ही उपयोग पर जोर डाला गया है।
कला की जीवंत अवधारणा को आत्मसात करने में यहाँ की प्रकृति का छात्रों को महत्वपूर्ण योगदान मिलता है। प्रकृति हमें वे सारे उपादान, अभिधा, लक्षणा और व्यंजना रूपों में ही उपलब्द्ध कराती है, जिससे कल्पना को विस्तार देने में छात्रों को मदद मिलती है। प्रकृति कला के शिक्षा-प्रदर्श्यों के निर्माण में हमारी बहुत बड़ी सहायता करती है।
श्रमदान :
यहाँ की उन परम्पराओं में श्रमदान अपना विशिष्ट स्थान रखता है, जो छात्रों को सहयोग एवं उत्तरदायित्व का बोध कराती हैं।विद्यालय के निर्माण के समय से ही विद्यालय मे श्रमदान की सुदृढ परम्परा रही है। इससे छात्रों में सामूहिक भावना का विकास होता है। गांधी जयन्ती के अवसर पर छात्र विद्यालय के आस-पास के क्षेत्रों मे भी श्रमदान किया करते हैं।
हॉबी-क्लब :
छात्रों को उनकी रुचियों में उत्कृष्टता प्रदान करने के लिए एयरो-मॉडलिंग, शिप-मॉडलिंग, राइफल क्लब, रेडियो क्लब, स्टांप-कलेक्शन (टिकट-संग्रहण), फोटोग्राफी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑर्निथोलॉजी, सिक्का-संग्रहण, बागवानी, स्टार-गेजिंग, पत्रकारिता, पाठ्यक्रमेत्तर भाषाओं यथा- बांगला, फ्रेंच आदि के जानकर शिक्षकों से उनका प्रशिक्षण, सामान्य जानकारी आदि लेने का उद्देश्य रखा गया था।
छात्रों को कृषि एवं वानिकी की भी शिक्षा दी जाती रही है। छात्रों को ग्रामीण परिवेश में रखकर इनकी शिक्षा देने के पीछे का उद्देश्य यह था कि ये छात्र जो कल देश और समाज का प्रतिनिधिनित्व करेंगे, ग्राम्य जीवन की बारीकियों को भी समझते रहें और अपनी वास्तविक जड़ से जुड़े रहकर उनके कल्याण के प्रति समर्पित रहें।
एन. सी. सी. :
छात्रों में विभिन्न गुणों को भरने के क्रम में तथा नेतृत्व-क्षमता, सामूहिकता आदि के विकास के लिए एन। एन. सी., स्काउट आदि भी नियमित समयचर्या में शामिल है. यहाँ पर एन. सी. सी. की तीनों इकाईयाँ (आर्मी, एयर व नेवल विंग) हैं.
कक्षा-व्यवस्था :
यहाँ की शिक्षा को गुणात्मक बनाने में छात्रों पर व्यक्तिगत निर्देशन का महत्वपूर्ण योगदान है। छात्रों को कम संख्या वाले निकायों में मेधा के आधार पर बांटकर शिक्षा देने की प्रक्रिया छात्रों के शिक्षण को समुचित पोषण देती है। पूर्व में एक सत्र में 60 लड़कों का एक बैच आता था, लेकिन अभी के 100 छात्रों के बैच में उन्हें 25-25 के चार उपवर्गों में मेधा के अनुसार रखा जाता है, जिससे छात्र-शिक्षक संवाद-संबंधों का यथेष्ट विकास होता है। छात्रों के व्यक्तित्व-निर्माण में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। छात्रों के मेधा-परिक्षण की निरंतरता उनके अन्दर की ज्ञान की ज्योति को जाज्वल्यमान बनाए रखती है। मासिक, त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं के आयोजन से छात्रों की मेधा का उत्तरोत्तर उन्नयन होता रहता है। छात्रों की मेधा के उन्नायक के रूप में शिक्षकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विद्यालय के सभी शिक्षक उच्च उपाधि प्राप्तकर्ता हैं और शायद ही कोई ऐसा माध्यमिक विद्यालय हो, जहाँ ऐसे विषय-शिक्षक हों, जो अपने-अपने विषय में न्यूनतम स्नातकोत्तर तथा विशिष्ट उपलब्धि वाले हो। उनकी योग्यताएँ भी उच्चस्तरीय हैं। स्टाफ रूम के अलावे हरेक शिक्षक को अपना अलग-अलग प्रकोष्ठ मिलता है और साथ ही उनके पढाने के कक्ष भी नियत होते हैं। ये प्रकोष्ठ उन कक्षों से सटे होते हैं। ये कक्ष preparatory room की तरह उपयोग में लाए जाते हैं। शिक्षक कक्षा लेने से पूर्व कुछ देखकर या पूर्व तैयारी करने के उद्देश्य से इसका उपयोग करते हैं। छात्रों के गृहकार्य की वे यहीं जाँच करते हैं और छात्रों की प्रगति का मूल्यांकन एवं अन्य शिक्षोपयोगी उपकरणों को रखने के लिए शिक्षक प्रकोष्ठ का उपयोग करते हैं।
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